एक गजल जनाबे जौन एलिया की, उसके पहलू से लगके चलते हैं, हम कहीं टालने से पहलते हैं, बंद हैं मैकडों के दर्वाजे, हम तो बस यूही चल निकलते हैं, मैं उसी तरह से बहलता हूं, और सब जिस तरह बहलते हैं, वो है जान, अब हर एक महफिल की, हम भी अब घर से कम निकलते हैं, क्या तकल्लुफ करें ये कहने में, जो भी खुश हैं, हम उससे चलते हैं, है उसे दूर का सफर दर्पेश, हम संभाले नहीं संभलते हैं, शाम फुरकत की लहलहा उठी, वो हवा है की जक्म बरते हैं, है अजब फैसले का सेहरा भी, चलना पड़िये, तो पाउं जलते हैं, हो रहा हूं मैं किस तरह बरबात, देखने वाले हात मलते हैं, तुम बनो रंग, तुम बनो खुश्पू, हम तो अपने सुखन में धलते हैं,
एक गजल जनाबे जौन एलिया की, उसके पहलू से लगके चलते हैं, हम कहीं टालने से पहलते हैं, बंद हैं मैकडों के दर्वाजे, हम तो बस यूही चल निकलते हैं, मैं उसी तरह से बहलता हूं, और सब जिस तरह बहलते हैं, वो है जान, अब हर एक महफिल की, हम भी अब घर से कम निकलते हैं, क्या तकल्लुफ करें ये कहने में, जो भी खुश हैं, हम उससे चलते हैं, है उसे दूर का सफर दर्पेश, हम संभाले नहीं संभलते हैं, शाम फुरकत की लहलहा उठी, वो हवा है की जक्म बरते हैं, है अजब फैसले का सेहरा भी, चलना पड़िये, तो पाउं जलते हैं, हो रहा हूं मैं किस तरह बरबात, देखने वाले हात मलते हैं, तुम बनो रंग, तुम बनो खुश्पू, हम तो अपने सुखन में धलते हैं,